3 वनकर्मियों को मारा, फिर हुई 8 साल की कैद, सबसे खूंखार ‘विक्रम’ की ये है स्टोरी

टाइगर विक्रम ने 2019 में गश्त पर गए तीन वनकर्मियों को मार डाला था, उसके बाद मौत होने तक उसका जीवन रेस्क्यू सेंटर में बीता
रामनगर: उत्तराखंड के विश्व प्रसिद्ध जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क से एक बड़ी खबर सामने आई है. ढेला रेंज के रेस्क्यू सेंटर में रखे गए चर्चित नर बाघ ‘विक्रम’ की मौत हो गई है. विक्रम ने 21 साल की उम्र तक जीवन जिया. विक्रम का जीवन वन्यजीव इतिहास में एक मिसाल बन गया है. पेश है इस ‘खूंखार’ लेकिन ‘ऐतिहासिक’ बाघ की पूरी कहानी…
कॉर्बेट के टाइगर ‘विक्रम’ का 21 साल की उम्र में देहांत: कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के ढेला रेंज स्थित रेस्क्यू सेंटर में रखे गए नर बाघ ‘विक्रम’ ने आखिरकार अपनी अंतिम सांस ली. कॉर्बेट प्रशासन के अनुसार, प्रथम दृष्टया उसकी मौत का कारण वृद्धावस्था है. करीब 21 साल तक जीवित रहने वाला यह बाघ भारत के सबसे उम्रदराज बाघों में शामिल हो गया है. आमतौर पर जंगल में बाघों की उम्र 12 से 15 साल मानी जाती है, जबकि कैद में यह 18 साल तक पहुंचती है. लेकिन विक्रम ने इस सीमा को भी पार कर दिया.
8 साल रेस्क्यू सेंटर में रहा विक्रम: कॉर्बेट टाइगर रिज़र्व के डायरेक्टर डॉ साकेत बडोला ने बताया कि 15 नवंबर 2019 को विक्रम को ढिकाला रेंज से रेस्क्यू किया गया था. इसके बाद उसे नैनीताल जू भेजा गया. फिर 20 अप्रैल 2021 को उसे वापस कॉर्बेट के ढेला रेंज स्थित रेस्क्यू सेंटर में स्थानांतरित किया गया. यहां उसकी विशेष देखभाल की जा रही थी. रेस्क्यू सेंटर में उसे 600 वर्ग मीटर के बड़े बाड़े में रखा गया था, जिसमें वाटर पूल और प्राकृतिक माहौल तैयार किया गया था.
पिछले साल विक्रम के ट्यूमर का ऑपरेशन हुआ था: वर्ष 2025 में वृद्धावस्था के चलते विक्रम को ट्यूमर की गंभीर बीमारी हो गई थी. इसके बाद कॉर्बेट के वरिष्ठ वन्यजीव चिकित्साधिकारी डॉ. दुष्यन्त शर्मा और उनकी टीम ने उसका सफल ऑपरेशन किया था. ऑपरेशन के बाद कुछ समय तक उसकी स्थिति स्थिर रही, लेकिन उम्र का असर धीरे-धीरे बढ़ता गया और एक साल बाद आखिरकार उसने दम तोड़ दिया है. मृत्यु के बाद एनटीसीए की गाइडलाइन के अनुसार बाघ का पोस्टमार्टम किया गया और फिर शव को मौके पर ही नष्ट कर दिया गया.
विक्रम ने 3 वन कर्मियों को मारा था: विक्रम की पहचान सिर्फ एक उम्रदराज बाघ के रूप में नहीं, बल्कि एक ‘खूंखार शिकारी’ के रूप में भी रही है. साल 2019 में ढिकाला जोन में इस बाघ ने तीन वनकर्मियों को अपना शिकार बनाया था. उस समय क्षेत्र में घास बेहद ऊंची थी और कई बाघ मौजूद थे, जिससे असली हमलावर की पहचान करना बेहद मुश्किल हो गया था. लेकिन विक्रम के विशालकाय शरीर और गतिविधियों के आधार पर उसे चिन्हित किया गया. इसके बाद कॉर्बेट प्रशासन ने कड़ी मशक्कत के बाद उसे ट्रेंक्यूलाइज कर पकड़ लिया था.
वन कर्मियों को मारने के बाद विक्रम का रेस्क्यू किया गया था: तीन वनकर्मियों का शिकार करने के बाद विक्रम को खुले जंगल में छोड़ना खतरे से खाली नहीं था. ऐसे में उसे रेस्क्यू सेंटर में ही रखा गया. करीब 8 साल तक उसने कैद में जीवन बिताया. इस दौरान उसकी देखभाल शानदार तरीके से की गई. भोजन में उसे ताजा मांस, विटामिन और मिनरल सप्लीमेंट दिए जाते थे. नियमित स्वास्थ्य परीक्षण के लिए उसके सैंपल बरेली स्थित आईवीआरआई (भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान) भेजे जाते थे.
8 साल से रेस्क्यू सेंटर में था विक्रम: विक्रम की रिहाई को लेकर कई सवाल उठे, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार, एक बार मानव का शिकार करने वाला बाघ दोबारा इंसानों के लिए खतरा बन सकता है. इसके अलावा उसकी उम्र भी रिहाई में बाधा बनी. 20 साल की उम्र पार कर चुके विक्रम के कई दांत झड़ चुके थे और बाकी घिस चुके थे. ऐसे में वह न तो खुद शिकार कर सकता था और न ही जंगल में अन्य बाघों से मुकाबला कर पाता. यही कारण रहा कि उसे जीवनभर रेस्क्यू सेंटर में ही रखा गया.
कभी खौफ का पर्याय था विक्रम: हालांकि विक्रम अपने अतीत में खौफ का पर्याय रहा, लेकिन रेस्क्यू सेंटर में उसका जीवन काफी शांत और सुरक्षित रहा. 600 वर्ग मीटर के बाड़े में वह अक्सर पानी में खेलता और मस्ती करता नजर आता था. उसकी हर गतिविधि पर नजर रखी जाती थी. उम्र के बावजूद उसका शरीर इतना मजबूत और विशाल था कि उसे देखकर लोग हैरान रह जाते थे.
रेस्क्यू सेंटर में बढ़ जाती है वन्यजीवों की उम्र: वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, देश में कैद में रहने वाले बाघों की उम्र आमतौर पर 18 साल तक होती है. ऐसे में विक्रम का 21 साल तक जीवित रहना अपने आप आश्चर्यजनक है. यह इस बात का भी प्रमाण है कि रेस्क्यू सेंटर में उसकी देखभाल उच्च स्तर की थी. विक्रम की कहानी सिर्फ एक बाघ की नहीं है, बल्कि यह मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ते संघर्ष की भी कहानी है. जहां एक ओर जंगल सिमट रहे हैं, वहीं वन्यजीवों का मानव क्षेत्रों में प्रवेश और हमले बढ़ना एक गंभीर चिंता बनता जा रहा है.
टाइगर विक्रम को दी गई अंतिम विदाई: रविवार 3 मई को टाइगर विक्रम ने अंतिम सांस ली. कॉर्बेट के अधिकारियों और वन्यजीव विशेषज्ञों की मौजूदगी में विक्रम को अंतिम विदाई दी गई. एक ऐसा बाघ, जिसने कभी दहशत फैलाई, लेकिन अंत में उसी सिस्टम की देखरेख में अपनी आखिरी सांस ली. कॉर्बेट का ‘विक्रम’ अब इतिहास बन चुका है, लेकिन उसकी कहानी आने वाले समय में वन्यजीव प्रबंधन और संरक्षण के लिए एक अहम सीख बनकर रहेगी.
भारत के सबसे उम्रदराज बाघ: चिड़ियाघर और रेस्क्यू सेंटर वन्यजीवों की उम्र बढ़ा देते हैं. उत्तर प्रदेश के कानपुर चिड़ियाघर का बाघ ‘गुड्डू’ 26 साल तक जिंदा रहा था. पश्चिम बंगाल के जलदापरा के बंगाल टाइगर ने 25 साल 10 महीने तक जीवन जिया था.




