धराली आपदा एक दुर्लभ गंभीर हाइड्रो-मौसमी घटना, नई स्टडी ने बताया फ्लैश फ्लड का असल कारण

धराली आपदा को लेकर नई रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें घटना होने के कारणों को विस्तृत तरीके से बताया गया है. रिपोर्ट- रोहित सोनी.
देहरादून: उत्तराखंड में उत्तरकाशी जिले के धराली में 5 अगस्त 2025 को दोपहर करीब 1:30 बजे के आसपास आए विनाशकारी फ्लैश फ्लड को लेकर नया शोध सामने आया है. वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी देहरादून के वैज्ञानिकों की एक रिपोर्ट बताती है कि इस आपदा के पीछे सिर्फ एक छोटी, तेज बारिश नहीं, बल्कि ऊपरी कैचमेंट में कई दिनों तक लगातार चले बारिश का दौरा, बर्फ पिघलना, भूस्खलन से आए मलबे और संकरी घाटी में पानी के रुकने के बाद अचानक टूटी झील जैसी घटनाओं को धराली आपदा के लिए जिम्मेदारी माना जा रहा है.
दरअसल, वाडिया के वैज्ञानिक डॉ. मनीष मेहता ने धराली आपदा आने के असल वजहों पर अध्ययन किया है. जिसकी रिपोर्ट Plausible causes and documented evidence of the debris flow near Dharali 10 मई 2026 को पब्लिश हुई है.
गंभीर हाइड्रो-मौसमी घटना: रिपोर्ट के अनुसार, ये घटना धराली-हर्षिल और सुक्खी के अलग-अलग वाटरशेड क्षेत्रों में करीब एक घंटे के भीतर आई बारिश से एक तरह की गंभीर हाइड्रो-मौसमी घटना बनी. आसान शब्दों में समझे तो Hydro-Meteorological event उन प्राकृतिक आपदाओं को कहा जाता है, जो जल चक्र और मौसम प्रणालियों के परस्पर प्रभाव से पैदा होती है. इसमें विनाशकारी बाढ़, अचानक आई बाढ़, बादल चक्रवात, सूखा और अत्यधिक भारी वर्षा शामिल है. इसी तरह की घटना के बाद धराली में फ्लैश फ्लड खेरागाड बेसिन (खीर गंगा) में आया, जिससे धराली बाजार का बड़ा हिस्सा पूरी तरह तबाह हो गया था. इस आपदा में 6 लोगों की मौत हुई थी और 68 लोग लापता बताए गए थे, जिनका आज तक कुछ पता नहीं चल पाया. यानी सरकार ने उन्हें बाद में मृत घोषित कर दिया था.
तीन जल धाराओं में बिगाड़ी स्थिति: वैज्ञानिकों के अनुसार, इलाके में हुए पक्के निर्माण, बस्तियों की स्थिति और नदी-धारा के पास बढ़ी मानवीय गतिविधियों ने इस नुकसान को और बढ़ाया था. वाडिया की अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार, 5 अगस्त 2025 को धाराली में खेरा गाड (खीर गंगा) से आई तेज बाढ़ के बाद एक घंटे के भीतर ताल गाड और भेला गाड में भी अचानक बाढ़ आ गई. तीनों धाराएं अलग-अलग सब-जलग्रहणों (Sub catchments) से निकलती हैं, इसलिए इतने कम समय में इनका एक साथ प्रभावित होना खास तौर पर चिंताजनक माना गया है.
NCRE और ISRO जांच में दिखाई दिया था विनाश: रिपोर्ट में बताया गया कि धराली आपदा में वहां काफी नुकसान हुआ था. होटल, मकान, दुकान और सेब के बागान भी नष्ट हो गए थे. घटना के बाद एनआरएससी (National Remote Sensing Centre) और इसरो (Indian Space Research Organisation) की उपग्रह-आधारित जांच में धराली बस्ती का करीब पूरा विनाश दिखाई दिया. इस आपदा में कल्पेश्वर मंदिर मलबे के नीचे पूरी तरह दब गया और बाढ़ से बने मलबा-फैन का क्षेत्रफल करीब 2 लाख वर्ग मीटर तक फैल गया, जो पहले के आकार से करीब तीन गुना बताया गया है.
3 से 5 अगस्त के बीच हल्की से मध्यम बारिश दर्ज की गई थी: रिपोर्ट के मुताबिक 3 से 5 अगस्त 2025 के बीच उत्तरकाशी जिले में बारिश हल्की से मध्यम दर्ज की गई. मौसम विभाग के मैनुअल रेन गेज और ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन डेटा में कहीं भी किसी अत्यधिक बारिश या क्लाउडबर्स्ट के संकेत नहीं मिले. यानी, जिले के निचले हिस्सों में उस स्तर की बारिश दर्ज नहीं हुई, जैसी आमतौर पर इतनी बड़ी बाढ़ के लिए वजह मानी जाती है, लेकिन ऊपरी क्षेत्र की तस्वीर अलग थी.
ऊपरी इलाकों में दर्ज की गई हेवी रेन: वाडिया के टोला कैंप (प्राथमिक रिसर्च और फील्ड बेस कैंप) और ग्लेशियर बेस कैंप जैसे उच्च-ऊंचाई वाले ऑब्जर्वेटरी में 3 से 5 अगस्त के बीच लगातार ज्यादा बारिश दर्ज की गई. रिपोर्ट के अनुसार टोला कैंप पर 108.4 मिमी और ग्लेशियर बेस कैंप पर 88.6 मिमी वर्षा रिकॉर्ड हुई.
इलाके की भू-आकृति आपदा की वजह बनी: वैज्ञानिकों ने इसे इस बात का संकेत माना है कि ऊपरी कैचमेंट में लगातार पानी गिर रहा था, जबकि निचले हिस्सों में वैसी तीव्र बारिश दर्ज नहीं हुई. वैज्ञानिकों ने धराली और उसके आसपास के इलाके की भू-आकृति को इस आपदा के लिए महत्वपूर्ण माना है.
रिपोर्ट में बताया गया कि धाराली बाजार समुद्र तल से करीब 2,537 मीटर की ऊंचाई पर है. वहीं, पुराने धराली गांव का हिस्सा अपेक्षाकृत ऊंचे भू-भाग पर है, जो नदी तल से करीब 150 मीटर ऊपर स्थित है. इसके उलट, नया बसाव पुराने बाढ़-जनित पंखे यानी ऑल्यूवियल फैन (Alluvial Fan) पर फैल गया, जिसका क्षेत्र करीब 60 हजार वर्ग मीटर बताया गया है. ऑल्यूवियल फैन पहले की बड़ी बाढ़ों और मलबा प्रवाहों से बना था. इसका मतलब है कि नया निर्माण उसी इलाके में बढ़ा जहां पहले से बाढ़ और मलबा आने का इतिहास रहा है.
नया बसाव अधिक संवेदनशील: वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि पुराने बसाव की तुलना में नया बसाव अधिक संवेदनशील था. अध्ययन रिपोर्ट में बताया गया है कि खीर गाड (खीर गंगा), ताल गाड और भेला गाड के ऊपरी हिस्सों में पुरानी और नई हिमोढ़ (Moraine) यानी हिमनद-जनित मलबा (Glacial debris) मौजूद हैं. ये ढलान बहुत खड़ी हैं और वहां ढीला, असंगठित मलबा काफी मात्रा में है. करीब 3,500 से 4,500 मीटर की ऊंचाई के बीच के हिस्सों में ऐसी ढलानें हैं, जहां बारिश के दौरान मलबा आसानी से खिसक सकता है.



