मिशन 2027 से पहले बीजेपी ने बढ़ाई सियासी रफ्तार, कांग्रेस अंदरूनी उलझनों में उलझी

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 से पहले जहां बीजेपी के एक्टिव दिख रहा है तो वहीं कांग्रेस अंदरूनी कलहों में उलझी हुई. रिपोर्ट- किरणकांत शर्मा
देहरादून: उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर सियासी सरगर्मिया तेज होने लगी हैं. चुनाव में अभी वक्त है, लेकिन राजनीतिक दलों की गतिविधियां बता रही हैं कि पर्दे के पीछे तैयारियों का दौर शुरू हो चुका है. बीजेपी ने चुनावी रणनीति को धार देने के लिए संगठनात्मक सक्रियता बढ़ा दी है. वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस अपनी अंदरूनी कलह में ज्यादा उलझी हुई नजर आ रही है.
केंद्रीय नेतृत्व और प्रदेश संगठन के बीच बेहतर तालमेल: चुनाव से ठीक पहले बीजेपी ने न सिर्फ उत्तराखंड का प्रदेश प्रभारी बदला, बल्कि उनके साथ दो सह-प्रभारी भी बनाए. ताकि आगामी चुनाव के लिए बीजेपी बेहतर ढंग से रणनीति बना सके. यहीं कारण है कि बीजेपी के प्रदेश प्रभारी राम माधव 6 दिनों में उत्तराखंड के पांच अलग-अलग दौरे कर चुके हैं. अपने इन दौरों के दौरान राम माधव ने पार्टी कार्यकर्ताओं से लेकर संगठन के वरिष्ठ नेताओं तक बैठक की, जो साफ बताता है कि बीजेपी चुनाव को लेकर अब एक्टिव मोड में है.
बीजेपी की रणनीति: बीजेपी की चुनावी रणनीति की बात की जाए तो संगठन की प्रत्येक इकाई को सक्रिय करने के साथ-साथ ही बूथ को पहले से ज्यादा मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है. सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाना और उसकी आधार पर जनता से समर्थन मांगना बीजेपी की चुनावी रणनीति का बड़ा हिस्सा है.
बीजेपी की चुनावी रणनीति पर उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत का कहना है कि
बीजेपी के सामने इस बार सत्ता में रहते हुए जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की चुनौती भी होगी. इसके साथ ही रोजगार, पलायन, भर्ती प्रक्रियाएं, महंगाई, स्वास्थ्य सुविधाएं और पहाड़ी क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे जैसे मुद्दों पर विपक्ष सरकार को घेरने की कोशिश करेगा. ऐसे में पार्टी को संगठन की सक्रियता के साथ अपने कामकाज का पक्ष भी जनता के सामने रखना होगा.
-जय सिंह रावत, वरिष्ठ पत्रकार-
वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत का ये भी मानना है कि उत्तराखंड में पहाड़ और मैदान की राजनीतिक परिस्थितियां अलग-अलग हैं. इसलिए सभी क्षेत्रों में एक जैसी रणनीति कारगर हो यह जरूरी नहीं हैं.
बीजेपी के लिए क्षेत्रवार मुद्दों को समझना, स्थानीय नेताओं के बीच समन्वय बनाए रखना और कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करना भी चुनावी तैयारी का अहम हिस्सा होता.
-जय सिंह रावत, वरिष्ठ पत्रकार-
मुकाबले से पहले घर संभालने की जरूरत: एक तरफ जहां बीजेपी ने अपनी चुनावी रणनीति को जमीन पर उतारना शुरू कर दिया है तो वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती फिलहाल पार्टी की एकजुटता को बरकरार रखना है. हाल ही में जिस तरह के कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत की धन्यवाद यात्रा और उनके बयानों पर कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा ने अपनी नाराजगी दिखाई है, उससे इन कयासों को और बल मिला है. इस मामले में हरीश रावत को दिल्ली भी तलब किया गया था. आज 9 अक्टूबर को दिल्ली में हरीश रावत ने कुमारी सैलजा से मुलाकात भी की है. इससे कांग्रेस में फिर से अंदरुनी कलह के नैरेटिव बना है.
वरिष्ठ नेताओं के बीच तालमेल कैसे बनेगा: कांग्रेस की इस अंदरूनी कलह पर वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत का कहना है कि प्रदेश में कांग्रेस की चुनावी तैयारी केवल सरकार को घेरने वाले मुद्दों तक सीमित नहीं रह सकती. पार्टी को यह भी तय करना होगा कि चुनावी अभियान की कमान किसके हाथ में होगी. वरिष्ठ नेताओं के बीच तालमेल कैसे बनेगा और संगठन की रणनीति को जिलों से लेकर बूथ स्तर तक कैसे पहुंचाया जाएगा. कांग्रेस के पास सरकार को घेरने के लिए रोजगार, महंगाई, पलायन और भर्ती जैसे मुद्दे हैं, लेकिन इन मुद्दों को चुनावी लाभ में बदलने के लिए लगातार जनसंपर्क और मजबूत संगठन की जरूरत होगी.
कांग्रेस की चुनौती यह है कि राजनीतिक संदेश स्पष्ट रहे और नेतृत्व से जुड़े मतभेद चुनावी एजेंडे पर हावी न हों. कांग्रेस की राजनीति में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है. उनका राजनीतिक अनुभव पार्टी के लिए ताकत बन सकता है, लेकिन चुनाव से पहले उनकी गतिविधियों और संगठन की रणनीति के बीच तालमेल भी उतना ही जरूरी है. प्रदेश कांग्रेस में अलग-अलग नेताओं की राजनीतिक सक्रियता को एक साझा अभियान में बदलना पार्टी नेतृत्व के लिए बड़ी परीक्षा होगी. यही करण है कि हरीश रावत को दिल्ली इसलिए बुलाया गया, क्योंकि वो अकेले ही जनता के बीच पहुंच रहे थे, जबकि सभी को साथ रहकर ही चुनाव लड़ना हैं.
-जय सिंह रावत, वरिष्ठ पत्रकार-
दोनों संगठनों की तैयारी में क्या है अंतर: बीजेपी और कांग्रेस की चुनावी तैयारियों की तुलना करें तो दोनों के सामने अलग-अलग तरह की चुनौतियां हैं. बीजेपी सत्ता में है, तो उसका फोकस अपने काम को सरकार के बीच ले जाना है. साथ ही विपक्ष के उस नैरेटिव को तोड़ना भी है, जिसे कांग्रेस, सत्ता के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रही है.
वहीं कांग्रेस की रणनीति सरकार के उन वादों पर हमला करने की है, जो उन्होंने चुनाव से पहले जनता से किए थे, लेकिन अभी तक पूरे नहीं हुए. सात ही कांग्रेस उन मुद्दों को भी भुनाने का पूरा प्रयास करेंगी, जिनमें बीजेपी को बैकफुट पर आना पड़ा था. इसके अलावा कांग्रेस की चुनौती पार्टी को एकजुट रखना है.
बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट कहते है की
कांग्रेस और बीजेपी के चुनाव अभियान की आपसा में तुलना करना बेमानी है. क्योंकि बीजेपी तो पहले दिन से ही चुनाव प्रचार में रहती है. हम जनता के बीच रहते है. इसीलिए हमे अलग से कोई तैयारी नहीं करना पड़ती है. हमारे प्रदेश प्रभारी से लेकर सह प्रभारी तक ग्राउंड होम वर्क के साथ तैयार रहते हैं.
-महेंद्र भट्ट, बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष, उत्तराखंड-
बीजेपी का रोजाना कुछ ना कुछ करना इस बात को संकेत है कि जानता के लिए उन्होंने पांच साल कुछ नहीं किया. अब चुनाव है तो बड़े दिखावे और जुमलों की प्लानिंग हो रही है. कांग्रेस जानता के मुद्दे के लिए ही दिल्ली से लेकर देहरादून तक सड़कों पर हैं. इस बार के चुनाव में मालूम होगा कि बीजेपी की बाहर-बाहर की तैयारी अधिक है या हमारे जानता से जुड़े मुद्दे. राज्य में एक तरह से चारों तरफ़ अराजकता फैली है, वो सभी की नजरों के सामने है.
संजय पालीवाल, प्रदेश उपाध्यक्ष, उत्तराखंड कांग्रेस-
वहीं उत्तराखंड की राजनीति को गहराई से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार किरण कुमार शर्मा का कहना है कि
चुनावी तैयारियों का आकलन केवल नेताओं के दौरों या बैठकों की संख्या से नहीं किया जा सकता है. बड़ी बात यह है कि इन बैठकों और दौरों का असर कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच कितना दिखाई देता है? बीजेपी नेताओं के दौरों से पार्टी को क्षेत्रीय परिस्थितियों और संगठन की कमजोरियों को समझने में मदद मिल सकती है.
-किरण कुमार शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार-
वरिष्ठ पत्रकार किरण कुमार शर्मा का मानना है कि कांग्रेस के लिए अपने नेताओं के बीच समन्वय स्थापित करना और स्थानीय मुद्दों पर निरंतर अभियान चलाना महत्वपूर्ण होगा.
जनता से जुड़े विषय चुनावी चर्चा को प्रभावित कर सकते हैं. दोनों दलों को इन मुद्दों पर साफ दृष्टिकोण के साथ जनता के बीच जाना होगा. हालांकि किसी भी दल की जीत या हार का निष्कर्ष अभी निकालना जल्दबाजी होगी. क्योंकि उम्मीदवारों का चयन स्थानीय, समीकरण और चुनाव के समय जनता का रुख भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे.
-किरण कुमार शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार-
वरिष्ठ पत्रकार किरण कुमार शर्मा के अनुसार उत्तराखंड के वोटर पढ़े लिखे है. बहुत हद तक दिल्ली के हालात पर ही राज्य की जनता वोट करती रही है. इसलिए हमने देखा है कि कई बार बड़ी तैयारी भी नेताओ को जीता नहीं पाई. यहीं कारण है कि कई बार जनता ने अपना मत चौंकने वाला दिया है. अभी के हालात में बीजेपी स्वाभाविक तैयारी में आगे है.

