गिरफ्तारी का लिखित कारण न देना अपने आप में जमानत का आधार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

बेंच ने कहा कि रिकॉर्ड में रखे गए मटीरियल की जांच से पता चलता कि हर स्टेज पर कॉन्स्टिट्यूशनल और कानूनी जरूरतें पूरी की गई.
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि गिरफ्तारी के लिए लिखित आधार न देना, अपने आप में जमानत का ऑटोमैटिक टिकट नहीं बन सकता, और पाकिस्तानी इंटेलिजेंस ऑपरेटिव्स को सेंसिटिव मिलिट्री जानकारी देने के आरोप में जासूसी के आरोपी व्यक्ति को दी गई राहत रद्द कर दी.
जस्टिस एमएम सुंदरेश और प्रसन्ना बी वराले की बेंच ने 28 अक्टूबर को दिए अपने फैसले में कहा कि हाई कोर्ट ने कथित प्रोसेस में गड़बड़ी को रेगुलर बेल देने का ऑटोमैटिक आधार मानकर गलती की, जबकि ओएसए (OSA), 1923 के सेक्शन 3 और 9, और बीएनएस के सेक्शन 152 और 238(b) के तहत अपराधों की गंभीरता, साथ ही जांच के दौरान इकट्ठा की गई और रिकॉर्ड में रखी गई जानकारी को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया.
बेंच ने झबरा राम को जमानत देने के राजस्थान हाई कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया. बेंच ने कहा, ‘इन हालात में हमारी राय है कि हाई कोर्ट का रेस्पोंडेंट को रेगुलर जमानत पर देना सही नहीं था. विवादित फैसले और आदेश को कानून में नहीं माना जा सकता और इसे रद्द किया जा सकता है.’
हाई कोर्ट ने रेस्पोंडेंट की रेगुलर बेल एप्लीकेशन को सिर्फ इस आधार पर मंजूरी दे दी कि रिमांड की कार्रवाई से पहले या उसके समय उसे गिरफ्तारी के कारण लिखकर नहीं बताए गए थे. कोर्ट ने माना कि मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य (2026) के मामले में, केस डायरी में दर्ज मौखिक जानकारी या खुलासा बीएनएसएस के सेक्शन 47 को पूरा नहीं करता है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसे यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि गिरफ्तारी के कारणों के बारे में बताना संविधान के आर्टिकल 22(1) और बीएनएसएस के सेक्शन 47 के तहत एक जरूरी संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा है. बेंच ने आगे कहा कि यह सुरक्षा इसलिए बनाई गई है ताकि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारणों के बारे में तुरंत बताया जा सके, ताकि वे कानूनी सलाह ले सकें, रिमांड का विरोध कर सकें और असरदार तरीके से कानूनी उपाय अपना सकें.
बेंच ने कहा कि पंकज बंसल (2024), प्रबीर पुरकायस्थ (2024) और मिहिर राजेश शाह (2026) में इस कोर्ट के फैसलों में दिखाए गए सिद्धांतों पर कोई विवाद नहीं हो सकता, लेकिन इस मामले में रिकॉर्ड में मौजूद मटीरियल से सामने आए तथ्य साफ तौर पर यह साबित करते हैं कि कानून के इस आदेश का काफी हद तक और असरदार तरीके से पालन किया गया था.
बेंच ने कहा कि बीएनएसएस के सेक्शन 483 के तहत रेगुलर बेल की मांग करने वाली एप्लीकेशन में कोर्ट को पहले से तय कानूनी और न्यायिक पैरामीटर पर विचार करना जरूरी है, जिसमें शामिल हैं: (i) आरोप का नेचर और गंभीरता, (ii) दोषी पाए जाने पर सजा की गंभीरता, (iii) आरोपी के फरार होने या सबूतों से छेड़छाड़ करने का खतरा और (iv) पब्लिक इंटरेस्ट और नेशनल सिक्योरिटी पर इसका बड़ा असर.
बेंच ने कहा, ‘गिरफ़्तारी के आधार बताने के तरीके के बारे में बहुत ज़्यादा टेक्निकल आपत्ति को रेगुलर जमानत पाने के लिए खुद से मिलने वाली, एक आम चाबी नहीं माना जा सकता, जो जमानत के कानून के मुख्य मापदंडों को दरकिनार कर दे.’
बेंच ने कहा कि रिकॉर्ड में रखे गए मटीरियल की ध्यान से जांच करने पर पता चलता है कि हर स्टेज पर कॉन्स्टिट्यूशनल और कानूनी जरूरतें पूरी की गई थी. बेंच ने कहा कि फॉर्मल गिरफ्तारी से पहले ओएसए (OSA), 1923 के सेक्शन 8(1) के तहत 23 जनवरी, 2026 और 26 जनवरी, 2026 के कानूनी नोटिस रेस्पोंडेंट को दिए गए थे.
इसमें उसे क्लासिफाइड मिलिट्री डेटा के अनऑथराइज़्ड ट्रांसमिशन की चल रही जांच के बारे में बताया गया था. बेंच ने कहा, ’30 जनवरी, 2026 को शाम 04:00 बजे गिरफ्तारी के तुरंत बाद, उसे पकड़े जाने का खास आधार बताया गया, जिसमें जासूसी और पोखरण और जैसलमेर में विदेशी हैंडलर्स को फोटो, वीडियो और स्ट्रेटेजिक ट्रूप मूवमेंट भेजना शामिल है.’
पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय ने केस डायरी के अवलोकन पर ध्यान दिया कि प्रतिवादी को संबंधित पुलिस अधिकारी द्वारा तथ्य और उसकी गिरफ्तारी के आधार के बारे में सूचित किया गया था, जैसा कि बीएनएसएस की धारा 47 के तहत विचार किया गया था.
पीठ ने कहा कि गिरफ्तारी ज्ञापन में दर्ज है कि, उसके मोबाइल फोन की तकनीकी जांच रिपोर्ट और उससे पूछताछ के आधार पर, वह अपने व्हाट्सएप नंबर के माध्यम से पैसे के बदले में एक पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के आकाओं के व्हाट्सएप नंबरों के साथ संपर्क में पाया गया था. और सेना की गतिविधियों के बारे में जानकारी के साथ-साथ भारतीय सेना से संबंधित रणनीतिक महत्व की तस्वीरें और वीडियो भी प्रसारित किए. यह सामग्री, जो स्वयं गिरफ्तारी का आधार बनती है, इस प्रकार प्रतिवादी को उसकी गिरफ्तारी के समय सूचित किया गया था’, पीठ ने कहा.
बेंच ने कहा, ‘रिकॉर्ड से साफ पता चलता है कि रेस्पोंडेंट को अपनी गिरफ्तारी की वजहों के बारे में पूरी जानकारी थी और रिमांड के स्टेज पर वकील ने उसे अच्छे से रिप्रेजेंट किया. इस तरह आर्टिकल 22(1) का असली मकसद सही मायने में पूरा हुआ है, और उसे कोई नुकसान नहीं हुआ है.’
बेंच ने कहा कि अगर कोई नुकसान नहीं हुआ है या बचाव का मौका नहीं दिया गया है, तो सर्विस के तरीके में कोई कहा गया प्रोसेस में कमी अपने आप हिरासत को गलत नहीं ठहरा सकती या किसी आरोपी को रेगुलर बेल का हक नहीं दे सकती, खासकर उन मामलों में जब जासूसी के गंभीर आरोप हों और जिनसे नेशनल सिक्योरिटी और सॉवरेन इंटेग्रिटी पर असर पड़ रहा हो.
बेंच ने कहा, ‘रेस्पोंडेंट, झबरा राम को दी गई रेगुलर बेल कैंसल की जाती है. रेस्पोंडेंट को आज से दो हफ़्ते के अंदर ट्रायल कोर्ट/जांच एजेंसी के सामने सरेंडर करने का निर्देश दिया जाता है, ऐसा न करने पर अपील करने वाली सरकार उसे कानून के मुताबिक तुरंत कस्टडी में ले लेगी.’




